
(पीटीआई) लंदन, 16 जून, 2020, मंगलवार
ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। इस विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोध के अनुसार, डेक्सामेथासोन नामक एक दवा कोरोना के उपचार में उपयोगी साबित हुई है।
कोरोना के मामले में, 80% रोगियों को घर पर ठीक किया जा सकता है। लेकिन कुछ गंभीर रोगियों को भर्ती करना पड़ता है और कुछ को ऑक्सीजन की कमी के लिए वेंटिलेटर पर रखना पड़ता है। दवा को ऐसे वेंटिलेटर पर रोगियों में मृत्यु दर को काफी कम करने के लिए दिखाया गया है।
शोधकर्ताओं ने कुल 2100 मरीजों पर दवा का परीक्षण किया। फिर उनकी तुलना 4000 अन्य रोगियों के साथ की गई। परिणामों में उन रोगियों में मृत्यु दर में 33 प्रतिशत की कमी देखी गई जिन्हें दवा दी गई थी। इसका मतलब है कि कोरोना वाले गंभीर रोगियों को ठीक किया जा सकता है और यहां तक कि अगर डेक्सामेथासोन के साथ इलाज किया जाता है तो उन्हें बचाया जा सकता है।
रिसर्च टीम के प्रमुख डॉ। पीटर होर्बी ने कहा कि यह दुनिया की एकमात्र ऐसी दवा है जिसने कोरोनरी मृत्यु दर को कम किया है। उनका दावा है कि अगर महामारी की शुरुआत से ही दवा का इस्तेमाल किया गया था, तो ब्रिटेन में अनुमानित 5,000 लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
यह दवा केवल गंभीर रूप से बीमार रोगियों के लिए उपयोगी है जो वेंटिलेटर पर हैं। यह दवा उन रोगियों के लिए काम नहीं करती जिनके लक्षण बहुत कम हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने दम पर दवा लेना जारी रखता है, तो लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। केवल एक विशेषज्ञ डॉक्टर ही यह तय कर सकता है कि दवा किसे दी जाए। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल किया जाए तो ऐसे मरीजों के इलाज की लागत बहुत कम हो सकती है।
अगर दस दिनों तक इलाज किया जाए तो इस दवा की लागत मुश्किल से पांच सौ रुपये हो सकती है। 1957 में खोजा गया, इस दवा का इस्तेमाल 1961 से अस्थमा सहित कुछ बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। सस्ते और आसानी से उपलब्ध होने के कारण, दवा का उपयोग गरीब देशों द्वारा आसानी से किया जा सकता है और शायद बढ़ती मौत का कारण भी बन सकता है।
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