
न्यूयॉर्क, सोमवार, 15 जून, 2021
विशाल अमेरिकी सेना का कार्बन फुटप्रिंट अन्य देशों की सेनाओं की तुलना में बहुत अधिक है। अनुमान है कि अमेरिकी सेना 150 देशों की सेनाओं की तुलना में अधिक प्रदूषण का उत्सर्जन करती है। ब्राउन यूनिवर्सिटी की कॉस्ट ऑफ वॉर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में अमेरिकी सेना ने ईंधन जलाने के लिए 3,000 किलोटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित किया। ऐसा एक दिन में 2.5 लाख बैरल से ज्यादा तेल की खरीद के कारण हुआ। इस तेल का इस्तेमाल सेना के तीनों अंगों में होता था। इस प्रकार अमेरिका में सेना की गतिविधियों और मशीनरी के कारण होने वाले प्रदूषण की अनदेखी की जाती है। यदि प्रदूषण का स्तर अधिक है, तो पेंटागन से संपर्क करना होगा, जो बहुत कठिन है। हालांकि सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत अमेरिकी रक्षा रसद एजेंसी द्वारा कुछ जानकारी प्राप्त की गई है जो कि रियायत में दी गई है।

अमेरिका की जलवायु नीति में भी काफी विरोधाभास है। सैन्य ठिकानों में अक्षय ऊर्जा पर जोर दिया जाता है लेकिन वास्तव में स्थिति काफी अलग है। जैव ईंधन का भी उत्पादन किया जाता है जो ईंधन लागत का एक बहुत छोटा अंश है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर सेना है। वैश्विक मारक क्षमता में अमेरिकी सैन्य क्षमता को दुनिया में नंबर एक स्थान दिया गया है, जो एजेंसी दुनिया भर के देशों को रैंक करती है। अमेरिका सेना पर 3 बिलियन खर्च करता है। इसके निकटतम प्रतिद्वंदी जैसे चीन और रूस इस कीमत में काफी पीछे हैं। यही कारण है कि इतना खर्च करने वाली सेना का कार्बन फुटप्रिंट अधिक होने वाला है। कोई भी व्यक्ति या संस्था या वस्तु पर्यावरण के लिए खतरनाक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है। इसे कार्बन फुटप्रिंट कहते हैं। ग्रीनहाउस ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के जोखिम को बढ़ाते हैं।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें