
नई दिल्ली, 13 सितंबर, 2021, सोमवार
पाकिस्तान की कठपुतली मानी जाने वाली तालिबान सरकार के गठन के बाद से अफगानिस्तान में आतंकवाद तेज हो गया है। जब अमेरिकी सेना 40 साल तक अफगानिस्तान में थी, तो लगता था कि आतंकवादियों का सफाया हो गया है, लेकिन दो दशक बाद वे वायरस से दोगुने जोर से उभरे हैं। तालिबान की उग्रवादी सरकार न केवल अफगानिस्तान में बल्कि मध्य पूर्व में भी अशांति पैदा कर सकती है। रूस ने चेतावनी दी है कि इस्लामिक स्टेट के 10,000 आतंकवादी अफगान सीमा पर फंसे हुए हैं। ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान समेत देशों को वहां आतंकी हमले का डर है। रूस ने खुद ही यह साबित कर दिया है कि वह आतंकियों की जानकारी देकर अलर्ट पर है।
रूस ने हथियारों सहित सैन्य सहायता ताजिकिस्तान को भेजी है, जिसकी अफगानिस्तान के साथ एक खुली सीमा है। इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी सीरिया और इराक में कमजोर होने के बाद अफगानिस्तान के खुसरान में मध्य एशिया में आईएस की शाखा को मजबूत कर रहे हैं। वे तालिबान से भी मेल नहीं खाते इसलिए आने वाला समय अफगानिस्तान के लिए मुश्किल होगा। अफगानिस्तान की भारत के साथ 100 किलोमीटर की सीमा है। तालिबान के कश्मीर में तोड़फोड़ करने के लिए अपने ही ज़ूनू समूहों में घुसपैठ करने की संभावना है। पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी के हक्कानी और आईएस सहित आतंकवादी समूहों से संबंध हैं। सरकार में तालिबान के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं। पंजशीर की लड़ाई में तालिबान की बहुत मदद की। इसलिए स्वाभाविक है कि भारत जैसे पड़ोसी देशों, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अफगानिस्तान की सीमा से जुड़े हुए हैं, की चिंताएं बढ़नी चाहिए।
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