
बर्लिन, मंगलवार, 11 जनवरी, 203
जो लोग आठ घंटे से कम की नींद लेते हैं, उनमें नकारात्मक विचारों के कारण अवसाद का खतरा अधिक होता है। इतना ही नहीं नींद की मदद से आप नकारात्मक विचारों को खत्म कर सकते हैं। इस प्रकार नींद का जीवनशैली पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। डिजिटल युग में स्मार्टफोन और मनोरंजन उपकरणों के उदय का ऊग पर प्रभाव पड़ा है। घंटों मोबाइल की स्क्रीन स्क्रॉल करने पर नींद नहीं आती। सोने के घंटे खत्म नहीं होते क्योंकि सुबह की दिनचर्या सोने के बाद शुरू होती है। कुछ समय ठीक रहता है लेकिन अगर यह लंबे समय तक नियमित हो जाए तो यह खतरनाक हो जाता है।
जर्मनी में बिंघमटन विश्वविद्यालय द्वारा कुछ साल पहले किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि नींद के पैटर्न इस तथ्य के लिए जिम्मेदार थे कि कुछ लोगों के दिमाग से एक भी शब्द नहीं निकला। जो लोग कम सोते थे उनके मन में नकारात्मक विचार अधिक आते थे। जबकि आठ घंटे से ज्यादा सोने वालों की दर काफी कम थी। इतना ही नहीं कम नींद से आपको कम ध्यान और एकाग्रता मिलती है। अध्ययन में भाग लेने वालों को देखने के लिए विभिन्न प्रकार के चित्र दिए गए। नींद के चक्र से परेशान लोगों में नकारात्मकता अधिक प्रचलित थी। एक स्रोत के अनुसार, दुनिया की 80% आबादी 8 घंटे से कम सोती है। तनावपूर्ण जीवनशैली और काम के घंटे बढ़ने से लोगों का सामाजिक और निजी जीवन प्रभावित हो रहा है। यदि लोग अपने सोने के समय और घंटों को नियंत्रित करें तो कई मनोविकारों से बचा जा सकता है।
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